न जानपी प्रेम
न जानामि प्रेमं 'प' वर्णम्।
उद्वैगप्रेमवीचि कथं हृदयम्।
कथम् सर्वसर्वस्व भवत्वम्।
जानामि त्वं च त्वं गुण रूपम्।।३।।
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प्रेम क्या होता है कैसे होता है इसके बारे मे मै कुछ नही जानती,प्रेम तो क्या प्यारे जु मुझे तो प्रेम के 'प' अक्षर का भी कुछ नही पता।
प्रेम की मधुर ऊँची लहरे किस प्रकार हृदय मे उछाल लेती है मै कहाँ जानती हूँ प्यारे जु।
मै कहती तो हू की तुम्ही मेरे सर्वस्व किंतु तुम्हे किस प्रकार अपना सर्व सर्वस्व कर लू,सर्वसर्वस्व सौप दू इसका कोई मार्ग भी तो मै नही जानती न।
मेरे प्यारे जु,मै आपकी प्यारी तो केवल और केवल,आपको और आपके गुण(आपके नयन,आपकी मुस्कान ,आपके श्रृंगार) आपके रूप को ही जानती हूँ,मेरे तो सर्वसर्वस्व आप ही है।
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