दोऊ एक रस

दोउ एक रस तऊ लली कछु अति मन भावै।
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सम रस सम वपु लाल लली तबहु,हया सिंगार लली कौ लाल सौ बढिकै बतावै।
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कोटि कोटि बढि जाए शोभा प्यारी न्यारी,जई लजा कै लली दए नैन दोउहु झुकावै।
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बसन एक भूषण एक एक ढंग पहरावनि,तापै बढै देखि लाल ओरि लाली रंग चढी जावै।
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अणु अंतर नाय चाहै "प्यारी" देखि दोउन,नेक लाज भर अंतर पिय प्यारी छब उर आवै।

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