कौन सौ देस

कौन सौ देस
लिखती पतियाँ,जो जानती
पिय जाय के कौन सो देश बसै।
नभ को सारे,कागज करती।
स्याही नैनो से भर लाती।
हसके लिखती,जो जानती।
पिय जाय के कौन सो देश बसै।
ये सोचती हू मै लेकिन
कैसे वो छूवन तुम्हारी लिखू
छूती मै भी,तो जानती
पिय जाय के कौन सो देस बसै।
बुनती क्यू ख्वाबौ के ताने
तुमसे हि लिपटकर रहती न
भरती बाहौ मे,जो जानती
पिय जाय के कौन सो देस बसै।
सुनते तो होगे तुम भी न
चुप चुपकर मेरी ये बाते
सुन लेती मै,जो जानती
पिय जाय के कौन सो देस बसै।

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