राधारमणा सजै इतराए

राधारमणा सजै इतराए।
कटि करि टेढी काढि नितम्ब कौ,धरै नितम्बनि कर बलखाए।
चंचल नैननि भौहे मटका कै,बहु भाँति अधर बनाए।
धोति पगरि धार बनै ग्वाले,एक कर लकुटि पै टिकाए।
ऐसी देखि इतरावनि नैन हटै ना,"प्यारी"डरपै पलक गिराए।

Comments

Popular posts from this blog

हरि आए संग

कहा प्राणन

तुव बिन पिया