माटी सौं प्रीत

माटी सो प्रीत
करिहै च्यौ माटी सो प्रीत रे मनवा।
बंधु तात सबै माटी जानिहै,जानिहै सबहि जीव।
मिलिहै ऐकौ दिना धुरि सबहि,तजि कर जुगल सौ प्रीत।
पंच देहि प्रथक्क हुई जाने,मिलै धूरि मा धूरि शरीर।
ता पै काय विचलित हुई जावै,काय काया होत अधीर।
कागज सौ काय प्रीत करिहै,धन कागज सम जान।
कौन करि सकै मान हमारौ,कहौ कौन घटावै मान।
रौंदी जानी एक दिना ही,माटी कागज मौल न कोई।
प्यारी होन सुफल तबै जानौ,जबै प्यारी तिहारौ होई।

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