कुच कंचुकी
कूच कंचुकी बंध गए टूट।
भुज-पाश बंधी जई अधर अधीर के,कसी नागरी फंद गई जई रूठ।
कटि कोमल दए फैराय अंगुरि पिय,अकुलाई लली भरि भरि भुज मूठ।
ग्रीवा रसाल विशाल अधर धरै , धीर प्राण कौ गयौ पिय छूट।
मधै परबत दोउ रस नदी भारी , ता नदी भए रसिक रस लूट।
चुंबित अणु अणु गात रस करतब,"प्यारी" अणु अणु अंग भरयौ पिय कूट। बंध
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