मन चल वृन्दावन की ओर
मन चल वृंदावन की ओर।
रे मन! चल वृंदावन की ओर।
जहाँ राधारमण मौरे प्यारे,दोऊ बाँह खोलिकै पुकारै,
इन चरणनि पा लै तू ठौर,रे मन चल वृंदावन की ओर।
मन चल......
जोरि विहरै जहाँ बिन पाहुन,जाकौ यश गावै देव पुराणन
सोई रज धारि सिर मन मौर,,रे मन चल वृंदावन की ओर।
मन चल...
रसरानी जमुनै जहाँ बहती,हित सेवा याम आठो रहती
हौके अनुगत रहै इन धौर,,रे मन चल वृंदावन की ओर।
मन चल.....
नाही जगमै कोऊ तेरौ अपना,निज रमणा बाकी सब सपना
लिजौ बाँध इन्ही सौ मन डोर,,रे मन चल वृंदावन की ओर।
मन चल.....
"प्यारी" दासी अरज बस योई,रज हौके मिलू रज सोई
नाही दूजी चाह कछु ओर,,रे मन चल वृंदावन की ओर।
मन चल वृंदावन की ओर
रे मन! चल वृंदावन की ओर।
मन चल.......
Comments
Post a Comment