स्वप्न की बात
स्वपन की बात
सखी री कहू सुपने कौ बात।
देखि सुंदर सुघड साँवरौ लये बंशी ऐकौ हाथ।
झोरे अरू झोरे जावती देखी अधर दुई ललचात।
दोरि कछु सम्मुख पिय आयी,छूये मृदुल कर गात।
टटोल लयी देह सपूरण,नाय खावै खिलाडी मात।
जाने नाय दूजी नार सतानौ,समुझै दाल अरू भात।
ऐसेहु रसिक जार प्रिय पै,वारू तन मन कौ बात।
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