पिय बरसै
पिय बरसै
पिय बरसै,पिय बरसै,अजहु सखी,पिय बरसै।
मगहु पडी बिकल लतासी,निकरत पिय ठाडत दैखी।
बैठत झौरै मुखहु उठाई,टेक देई कर पकरि बैठी।
सीकर पीत पटासौ पौछै,अंक लैई कर लट पलोटी।
आवत सुधि अनसुझ लिपटी,बाहँ गरै डाल न छोडी।
दशा कौन रौग भयी तेरी,मंद हसै पूछे कह गौपी।
टेढैहु नैन तरेरत कहिए,जै सबै तैरौ रूप सौ हौती।
आबत जाबत लौग दैखिहै,मग मंदमति इकली बतियाती।
आपहु आप हसत रहि,आपहु नैन भरि भरि रौती।
कौन ठगौरी तैरौ नामहुमा,जौई सुनिहै सौई बाबरी होती।
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