कहि बहौत गई ना कहि थोरि।
कहि बहौत गई ना कहि थोरि।
रसिकन श्वास श्वास भर गाए,तऊ बरनी गई ना रस जोरि।
शेष महेश चतुर मुख ब्रह्मा,भए मौन कहि ना गयो ओरि।
गाए विणा-वादिनी वेदन चारो,नाहि पहुच सकै तट धोरि।
छिन नूतन नित वर्धित देखि,कहो कहि सके किस विध पूरी।
जोरि जोरी कर गावत"प्यारी",गई अणु आध नाहि बोरि।
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