लली यौ नैनन मन की कहै।
लली यौ नैनन मन की कहै।
अरूण रंग कहे सुरति जगी रैना,चमकत तो प्रेम अधिकाई सो बहै।
झुकी बरौनि ढुरै कहे रस लज्जा,झुक उठिहै सम्मति पिय को दए।
देखे नैननि कौर तो पिय ललचावै,अध-खुलै जो गाढित रस मे रहे।
अधिक जानै नाहि कहे बस थोरि,सबई तो "प्यारी" नाय कहत जए।
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