दरस रस जोरि प्रथम किजिहौ।

दरस रस जोरि प्रथम किजिहौ।
भौरई सखी रंग भुवन पट खौले,झाँकि झीनै परदो दरस लिजिहौ।
थमिकै कछु धीरै पट खैच डारै,दौने नैनन रस भरिकै पिजिहौ।
दृगन सहज मूंदे कसै भुज गाढै,बिथुरै केश कुसुमनि सेज देखिहौ।
जगावै हित मन मानै नाही "प्यारी",चहै योई लिपटाए हमेस राखिहौ।

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