लाज बिसराउं

लाज बिसरावू
कुल को लाज बिसराय मिलू पिय।
उघारि दउ पट घूंघट लाज कौ,सरम तजी अज जानी।
डोलती फिरू इकली ब्रज माही,कोउ नाही संग लै जानी।
पिय मैरो मै पिव कौ ह्यै जावू,कोउ को इक नाही मानी।
जग समुझावै मै जग समुझावू,थारैै कोउ काज नाही आनी।
हू तौ दासी जुगल जोरि कौ,प्यारी चरणा हेत लगानी।

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