कौन बात इतराय
कौन बात इतराए।
तन कारौ मन कारौ निर्मोही,गौरी जशोदा कौ ना जाय।
ठेठ निठल्लै संगी साथी सब,गौरस फिरतै गाम चुराय।
नैन धरै वृषभानु लली पै,कोउ दरपण तोय ना दिखाय।
वक्ष तान चलत अति मान,भूलि गयौ जई हा-हा खाय।
जानौ हम राधे सौ ना भोरी,दूध छठि कौ याद दिलाय।
मुख शोभा ऐसी लाल होई,विधना इन सौ-ना भोला बनाय।
तबहु लली हसी दी ठठाय,"प्यारी" देखि पि गए लजाय।
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