मन चल वृन्दावन की ओर
मन चल वृंदावन की ओर।
रे!मन चल वृंदावन की ओर।
जँहा राधारमण मौरे प्यारे,दोउ बाँह खोलिकै पुकारे,इन चरणनि पा लै तू ठौर।
जोरि विहरे जँहा बिन पाहुन,जाको यश गावै देव पुरानन,सोई रज धारि सिर मन मौर।
रसरानी जमुनै जँहा बहती,हित सेवा याम आठो रहती,हौके अनुगत रहे इन धौर।
नाही जगमे कोउ तेरो अपना,निज रमणा बाकी सब सपना,लिजौ बाँध इन्हीं सौ मन डोर।
"प्यारी" दासी अरज बस योई,रज हौके मिलू रज सोई,नाही दूजी चाह कछु ओर।
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