ललितै अंक बैठे दोउ देखे,आरस भीनै प्यारौ लाल लली।
दहिनै लाल लली राजति बाँए,अंसनि सिर भुज गले डली।
कर नैनन पग करत खिलारी,छूवै एकही संग एकही लरी।
कटि फैरे कर सहलावै ललिता,लाड लडावै अति प्रेम भरी।
सखी हरिदासी अति किन्ही किरपा,"प्यारी" हिय रौपी लाड कली।

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