पीर प्रेम
पीर प्रेम बडी दुखदाई।
कही जावै ना सही जावै जे,रहवै भीतर भीतर खाई।
जीवै दैवे ना देवै मरण ही,राखै प्राण अधर लटकाई।
रौवन चहै जल नैन ना निकसै,मरू भाँति सौ हिय बनाई।
तापै कोउ या सौ नाही भावै,चहै राखै छाती लिपटाई।
कहै "प्यारी" चालौ सोच समुझ कै,प्रेम मारग पीर अधिकाई।
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