प्रीत हिय कैसो
प्रीत हिय कैसौ
प्रीत हिय कैसौ होय सुनिहै।
प्रथम होहिहै सिल समानै,जबै आवत प्रीती हुहिहै।
तद् घिसिहै कूप समानै,ज्यौ डोरि दिन दिन कूप घिसिहै।
हिय ना किजिए सिल कौ जैसौ,व्यसन रेख पडै नाय मिटिहै।
ता पै हुहि जई रेत सम हि,कणि कणि होय बिखरै।
कणिका जैसौ रेख बनावै,कछु पलहि जाय हटिहै।
बढिहै प्रीत कछु निर्मल होहै,जल सम चित्त हुहिहै।
जलहि जैसौ रेख बने,परि संग संग ही मिटिहै।
ओरि बढिहै प्रीत किजिए,नभ सम कर लहिहै।
जैसो नभ ताई रेख बनै नाहि,व्यसन रैख नाही बनिहै।
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