नित्य रसिक

नित्य रसिक
नित्य सत्य रसिक श्यामसुन्दर।
सदा प्रियतमा सुख हेतूू होवै,सदा करत नित नित नव चाव।
देह सो चाव रति न कहावे,कहावे ह्रदय उठत नव भाव।
संग असंग देहि गुण नाय दोषा,जैसी प्रियतमा तैसी प्यारी।
कोटि जतन एको श्याम करिहै,छबि लखन ऐको बारी।
होर लगावत प्रेम देनिहै,तुव देउ सुख जगत को सारौ।
स्व नित ही अवगुण हौ जानिहै,प्रिय जानै गुण खान हो भारौ।
देहि सो देहि प्रेम नाय प्रीती,प्रिती हिय सो हियहि होई।
प्यारी जानिहै कहा बिषय घिरौ मानुष,जानिहै सोई डूब्यौ जौ होई।

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