प्रेम
प्रेम
कारण होय टूटिहै नाय,प्रेम सोई जानिहै।
सुखी लाल सुख होहिए,प्रेम सोई मानिहै।
प्रेम फल पकिहै हिय द्रवै,सोई नेहा उपजौ जानिहै।
नेह बढिहै मान होहै,बहिर मान भीतर प्रीत धारिहै।
मान होय प्रणय आवै,बिस्वास पिय प्यारी अतिहि गाढिहै।
रागहु प्रणय बादहौ आवै,अतिहि दुखै सुखी होय राहिहै।
रागै बदलै अनुरागै होहि,नित नव माधुरी प्रीत दीखाहिहै।
अनुराग गाढिहै महाभाव होय,भेद लाल लली मिटाहिहै।
रीति प्रीत दासी कहिहै,रसिक बाणी लिखै शीश झुकाहिहै।
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