उलाहना पद

उलाहना पद
हरत हिय हरि न पूछी बात।
रूप रसिक रस रंग दैखिहै,हिय लीन्हौ ललचात।
नैन सैन बस कर रखिहै,अबहु नाही जानात।
ज्यौ यौ अली सम पिय जानती,रोकती हिय बलात।
कहा करिहै कहा कहिहै का सौ,अब गयी आयी हुई बात।
हिय फैरियौ प्यारी कौ गिरधर,नाय हमरै बस प्रीत हात।

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