राधिके दासी

राधिके दासी
राधिके दासी मंज्जरी प्यारी।
नित नव चाव लाड लाडैती,मानै दासी राधा सुकुमारी।
टहल सबहि संभारती मंज्जरी,नाय कछु आपन चहारी।
पिय स्वामी श्यामा स्वामिनी इनकौ,दोउन ना भेद मनारी।
घौमत घिरनी सी नित कुंजन,करत सिखावत टहल सखीरी।
जानत हिय पल भाव स्वामिनी,आवत ही पूर्ण सबै कारी।
माधव सेवती जान संपत्ति स्वामिनी,नेक निज अधिकार न बिचारी।
हिय प्यारी होये कदै ऐसौ,पल छिन मंज्जरी होन पुकारी।

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