जुगल जोरी

जुगल जोरि
राजति निकुंज जुगल जोरि।
राजत घनही द्युति सौ,एक होहि रंग रस कौ हौरि।
स्वर्ण रश्मि सम बसन धारै,भूषण कुसुम कौ री।
गलबहिया दुई दिये परस्पर,अंग अंग ढुरि ज्यौरि।
नैन अरूझै आप ही बिम्ब सौ,अधर सो रस झरौ रि।
फसत कर रहही पकरौ,निकट पुनि अरू ओर हौरि।
बचन कहत कोऊ नाहि,नैनन ही सबै बात हौरि।
चरण सेवत प्यारी दोउन,मिल बैठायी जुगल जोरि।

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